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…तो पत्रकार क्यों नहीं बन जाते…?

आर एस पटेल – 

पहले केवल सच और साहस था, आज दलाली, ब्लैकमेलिंग, चापलूसी, खुशामद यही वर्तमान पत्रकारिता के मापदंड!

बुंदेलखंड/उत्तर प्रदेश। बेरोज़गारी और मीडिया ग्लेमर, इन दोनों ने मिल कर युवा पीढ़ी का बेड़ा ग़र्क़ कर रखा है। आज सब से आसान काम पत्रकार बनना है। जो किसी काम का नहीं, वो भी इस जमात में आसानी से फिट हो सकता है। आज जिसको देखो वो पत्रकार बनने को उतावला है। काश! वो पत्रकारों के जीवन को नज़दीक़ से देख पाते। बेचारा, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं एवं अपने पेशे के उसूलों के दो पाटों के बीच नित्य पीसा जाता है।

नेता, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील,आईएएस सब अपनी औलादों को वही पेशा उपलब्ध करवाने में जी जान से जुटे रहते हैं, पर पुराने पत्रकार, अपने बच्चों से साफ बोल रहे हैं। बेटा ठेला धका लेना मगर, इधर का रूख़ मत करना। एक वो दौर था, जब नेता पत्रकार से मिलने को लालायित रहता था और अब सुबह से नेताओं के बंगलों पर पत्रकारों का झुंड नज़र आता है। पहले केवल, सच और साहस था, आज दलाली, ब्लैकमेलिंग, चापलूसी, खुशामद यही वर्तमान पत्रकारिता के मापदंड हैं।

राजधानी भोपाल के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में स्थानीय के अतिरिक्त विभिन्न प्रांतों के युवा पत्रकार बनने के ख़्वाब ले कर आते हैं और फिर विभिन्न मीडिया संस्थानों के शोषण का शिकार होते हैं। वे सभी बड़े-बड़े ठंडे स्टूडियो में कोट-टाई, और लिपिस्टिक से सराबोर महिलाओं में अपना भविष्य देखते हैं। उन्हें इस टाई और लाली के पीछे की कालिख नज़र नहीं आती। सियासत और पत्रकारिता में किसी प्रकार की क्वालिफिकेशन की आवश्यकता नहीं। नतीजा आज इन दोनों पेशों ने मिल कर देश की वाट लगा रखी है।

बुलबुल पर सवारी और आटा लीटर में कौन नापता है भाई? मगर नापा जा रहा है और लोग उसका समर्थन भी कर रहे हैं। यही हाल पत्रकारिता का है। पान गुटखे का ठेला लगाने वाले से लेकर, ऑटो ड्राइवर गाड़ी पर और कपडों पर ईस्त्री करने बाला भी साईकिल पर शान से प्रेस लिखवा सीना फुलाए फिरता है और क़ानूनन वो ऐसा कर भी सकता है। क्योंकि उसने दो सौ खर्च कर दिल्ली से टाइटल जो मंगवा रखा है। जिनके अख़बार, पत्रिकाएं हवा में छपते हैं, उनको हज़ारों के विज्ञापन मिल रहे हैं। 

आपको भी मिल सकता है, बस आपकी जेब गर्म हो और ख़ुशामद आनी चाहिए। आपको बिना छापे नियमितता प्रमाणपत्र चाहिए? कोई मुश्किल नहीं संभागीय कार्यालय में बाबू को दो हज़ार दीजिए सर्टिफिकेट हाज़िर है। अधिमान्यता के भाव तनिक अधिक हैं, मगर मुश्किल क़तई नहीं। ऐसे ऐसे अधिमान्य पत्रकार आपको मिल जाएंगे जिनसे मिलने के बाद आपको अपने पत्रकार होने पर शर्म आएगी। जनसंपर्क के अधिकतर कर्मचारियों की जेब में आपको अधिमान्यता का कार्ड मिल जाएगा।

प्रजातंत्र में बकलोल जनता से लेकर इन तरह के पत्रकार होंगे तो विकास होना लाज़मी है और हो भी रहा है, ये बात अलग है कि वो कैसा विकास है।

(Credit Fb R S Patel) फोटो सभार वरिष्ठ पत्रकार हेमंत मालवीय

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