देशनई दिल्लीराज्य

जाति जनगणना के पक्ष में बामसेफ का (25 मई) भारत बंद का आह्वान!

डॉ सिद्धार्थ

भाजपा को छोड़कर कोई भी महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टी जाति जनगणना के खिलाफ नहीं!

नई दिल्ली/भारत। जाति जनगणना के पक्ष में बामसेफ के भारत बंद (25 मई) के आह्वान का हमें समर्थन करना चाहिए!

जाति जनगणना जरूरी क्यों?

जाति जनगणना भारत में वर्ण-जाति वर्चस्व और अन्याय को तोड़ने का आधार मुहैया काराएगा और न्याय, समता, स्वतंत्रता, बंधुता आधारित लोकतांत्रिक भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा। ऐसे भारत की रचना में मदद करेगा, जिसमें समृद्धि में सबका समान हक हो।

भारत में सबसे के लिए न्याय, विशेषतर पर ऐतिहासिक अन्याय के शिकार बहुजनों के लिए न्याय का पक्षधर हर व्यक्ति जाति जनगणना को भारत में नौकरी एवं शिक्षा आदि में समान अवसर और संसाधनों में समान हिस्सेदारी के लिए लिए जरूरी मानता है और सभी ने जाति जनगणना के पक्ष में विस्तार से तथ्य और तर्क दिए हैं।

जाति सभी जातियों की गणना की मांग-

जो लोग जाति जनगणना की मांग कर हैं, वे सिर्फ ओबीसी जातियों की गणना की मांग नहीं कर रहे हैं, वे सभी जातियों की गणना की मांग कर रहे हैं, जिसमें तथाकथित अपरकॉस्ट के साथ मुस्लिम, ईसाई और अन्य धर्मावलंबियों के बीच जातियों की जनगणना की मांग भी शामिल है।

सुप्रीमकोर्ट को दिए अपने हलफनामें में केंद्र की मोदी सरकार ने जाति जनगणना से इंकार कर दिया था। हालांकि केंद्र सरकार जाति जनगणना के प्रश्न को ओबीसी जातियों के गणना तक सीमित करते हुए कहा है कि ओबीसी जातियों की गणना लंबा और कठिन काम है।

जाति जनगणना के मामले में भाजपा का रूख-

इस समय भाजपा को छोड़कर कोई भी महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टी जाति जनगणना के खिलाफ नहीं है, लेकिन जाति जनगणना के पक्ष में सड़क पर उतरकर बड़ा जनांदोलन करने की किसी की हिम्मत नहीं, क्योंकि उन्हें तथाकथित अपरकॉस्ट के नाराज हो जाने का डर सता रहा है। आज भी इस देश का शासक वर्ग अपरकॉस्ट है, 2014 के बाद यह फर्क पड़ा है कि मुसलमानों के अपरकॉस्ट को भी काफी हद तक शासक वर्ग से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, अब शासक वर्ग में सिर्फ अपरकॉस्ट-अपरक्लास मर्द हिंदू बचे हैं।

उदारवादी बुद्धिजीवियों का रूख-

अधिकांश लिबरल बुद्धिजीवी छिपे तौर पर और कुछ हां-हूं-ना के साथ जाति जनगणना के विरोध में हैं। वामपंथी पार्टियां औपचारिक तौर पर जाति जनगणना के पक्ष में है, लेकिन वे इसे इतना बड़ा मुद्दा नहीं मानती की उसके लिए जन संघर्ष का रास्ता चुने। उनमें कुछ तो भीतर-भीतर जाति जनगणना के खिलाफ भी हैं, भले ही खुले तौर जााहिर न कर पाएं।

कांग्रेस का रूख-

वर्तमान समय में कांग्रेस सैद्धांतिक तौर पर जाति जनगणना के पक्ष में है लेकिन वह भी इसे व्यापक मुद्दा बनाने से बचना चाहती है।

कार्पोरेट मीडिया तो जाति जनगणना के खिलाफ ही है।

बसपा-सपा का रूख-

राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रदेश उत्तर प्रदेश की दोनों बहुजन पार्टियां (बसपा और सपा) सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों के पटाने में लगी हैं, वे सड़कर उतरकर जाति जनगणना के पक्ष में आंदोलन खड़ा करने के बारे में सोच भी नहीं रही हैं।

आखिर रास्ता क्या है?

ऐसे में बड़े पैमाने पर सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी कार्यकर्ता और सामाजिक संगठन राष्ट्रव्यापी एका बनाकर बड़ा संघर्ष और आंदोलन खड़ा कर सकते हैं और सरकार को जाति जनगणना के लिए बाध्य कर सकते हैं। इससे राजनीतिक पार्टियां भी साथ आने को बाध्य होंगी। यही एकमात्र रास्ता है।जाति जनगणना न करा पाना, बहुजन समाज की एक और ऐतिहासिक पराजय होगी।

(Credit Fb Siddharth Ramu)

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