देश

कोरोना- सरकार की नाकामी और जनता की मूर्खता !

राम जनम यादव

दिसंबर 2019 में कोरोना का आतंक शुरू हुआ और धीरे धीरे पूरी दुनिया में फेलने लगा। भारत में फ़रवरी में नमस्ते ट्रम्प का आयोजन होना था इसलिए सरकार ने कोरोना की ख़बरों को सीरीयस नहीं लिया और नमस्ते ट्रम्प के आयोजन में जुटी रही।

नमस्ते ट्रम्प का सफल आयोजन हुआ, लाखों लोग इकट्ठा हुए और भारत में कोरोना के केस आने शुरू हो गए। सरकार ने आनन फ़ानन में देशभर में बिना किसी तैयारी के लॉक्डाउन घोषित कर दिया। सरकार फँस चुकी थी, सरकार को अंदाज़ा था कि हवाईअड्डो पर रोक ना लगाकर उसने बड़ी भूल कर दी है। अगर सरकार पहले ही भारत में आने जाने वाली फ़्लाइट पर रोक लगा देती इसको रोका जा सकता था । सरकार के गले में नमस्ते ट्रम्प का आयोजन हड्डी की तरह फँस चुका था।

सरकार को इस मुसीबत से निकाला मरकज़ ने। जब लॉकडाउन घोषित हुआ तब मरकज़ में तीन हज़ार के क़रीब लोग थे जिनमे कुछ विदेशी भी थे, लॉकडाउन की वजह से वो सभी लोग मरक़ज मे फँस गए। दिल्ली सरकार पहले ही 100 लोगों के किसी भी आयोजन पर पाबंदी लगा चुकी थी, मरकज़ में लोगों का जमा होना उस समय ग़ैर क़ानूनी था। सरकार को चाहिए था कि सरकार उचित धाराओ में मौलाना साद को गिरफ़्तार करती और बाक़ी मरकज़ में मौजूद लोगों को 14 दिन के लिए क्वॉरंटीन करके उन्हें वापस उनके घर भेज देती लेकिन सरकार ने इसे अपने बचाव के लिए सुनहरा मौक़ा समझा। सरकार ने देसी जेम्ज़ बॉंड अजित डोवाल को मरकज़ में भेजा, उनकी मौलाना साद से मुलाक़ात हुई और उसके बाद मौलाना साद ग़ायब हो गए। मौलाना साद पर जब मुक़दमे क़ायम ही करने थे तो देसी जेम्ज़ बॉंड उनसे क्या डील करने गए थे ? फिर तो महीनो तक गोदी मीडिया अपने स्टूडीओ में मौलाना साद को ढूँढता रहा, मरकज़ के ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी ख़बरें चलाता रहा, सोशल मीडिया पर हिंदू मुसलमान इस पर बहस करते रहे। पेंडामिक गोदी मीडिया की महनत से हिंदू मुस्लिम की नफ़रत में बदल गया। ठेले वाले, सब्ज़ी वालों का लोग धर्म पूछने लगे। ना तो मौलाना साद ने कभी ज़रूरत महसूस की कि मरकज़ के ख़िलाफ़ चल रहे प्रॉपगैंडा को ख़त्म करने के लिए सामने आए, गिरफ़्तारी दे और क़ानून का सामना करे और ना ही किसी मुस्लिम तथाकथित बुद्धिजीवी ने इस पर कुछ बोलना ज़रूरी समझा। फ़ेसबुक पर क्रांतिकारी मरकज़ के नाम पर लड़ते रहे और गोदी मीडिया के फ़र्ज़ी प्रॉपगैंडा से लड़ते रहे। अगर मौलाना साद उस वक्त अपनी गिरफ़्तारी दे देते तो मरकज़ के नाम पर गोदी मीडिया अपना अजेंडा नहीं चला पाता और साद साहब भी बाक़ी मरकज़ के लोगों की तरह बाइज़्ज़त बरी हो जाते लेकिन मौलाना डोवाल से डील कर चुके थे इसलिए चुप थे।

पहली लहर में सरकार मरकज़ की आढ़ में अपनी असफलता छिपाने में कामयाब रही। अब दूसरी लहर आयी तो इसमें भी सरकार इसे किसी भी बहाने से हिंदू मुस्लिम बहस में उलझाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए सबसे पहले सरकार ने कुम्भ के आयोजन को करवाया। कुम्भ की तस्वीरें आनी शुरू हुई तो मोदी विरोधियों ने कुम्भ की तस्वीरें वाइरल करना शुरू की। कुम्भ के आयोजन पर सरकार से सवाल पूछने की बजाय हम लोग मरकज़ का स्कोर लेवल कर रहे थे, सरकार भी यही चाहती थी। मुसलमानो ने कुम्भ की तस्वीरों के साथ यह कहाँ की जमात है ?
यह कौन सा मरकज़ है ?
जैसे मीम चिपकाने शुरू कर दिए। मुझे पूरा यक़ीन है कि यह मीम भी आईटी सेल से ही आए थे और इन्हें वाइरल कराने में भी उनकी ही भूमिका थी। कुछ दिन के लिए ही सही, कुछ लोगों तक ही सही, हिंदू मुस्लिम बहस तो हुई। अब अलविदा जुमे की मक्का मस्जिद की हैदराबाद की तस्वीर वाइरल हुई और अगले ही दिन बदायूँ के एक बड़े मौलाना की जनाज़े में उमड़ी भीड़ की विडीओ वाइरल होनी शुरू हो गयी। अब जुमरात या जुमे को ईद होगी तो उसकी विडीओ वाइरल करने की तैयारी चल रही होगी, बाज़ार में होने वाली भीड़ की तो विडियो आनी शुरू भी हो गयी है। दिल्ली के जामा मस्जिद और ओखला जैसे मुस्लिम इलाक़ों में तो गोदी मीडिया के बहादुर पत्रकार भीड़ को अपने कैमरा में क़ैद करने पहुँच भी गये हैं। हम फिर मूर्ख बनकर हिंदू भीड़ और मुस्लिम भीड़ पर बहस शुरू कर देंगे।

मरकज़ का मामला हो, कुम्भ का मामला हो, बदायूँ की जनाज़े की भीड़ हो, गुजरात की शोभा यात्रा हो या ईद की भीड़ हो, इस सबके लिए सरकार और प्रशासन ज़िम्मेदार है। भीड़ आसमान से टपककर नहीं आयी थी, प्रशासन भीड़ इकट्ठी होने क्यो दे रहा था ? मुसलमान भीड़ है तो इसे आप वाइरल करके खुश हो जाओ और हिंदुओ की भीड़ है तो इसे मुसलमान वाइरल करके ख़ुश हो जाएँ। हक़ीक़त यही है कि हम लोग मूर्ख हैं और अपनी मूर्खता में हम सरकार से सवाल पूछने की बजाय सरकार के ट्रैप में फँस जाते हैं। अगर लॉक्डाउन में कहीं भीड़ इकट्ठी हो रही है तो जवाबदेह प्रशासन होगा या भीड़ ?

जस्टिस काटजू की राय भारतीयों के बारे में सटीक है।

(इब्न ए आदम Fb)

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